व्यक्ति अपनी जीवन में भौतिक रत्नों को अत्यन्त महत्व देता है लेकिन यह भूल जाता है की मनुष्य के जीवन में भौतिकता के साथ साथ भावनात्मकता भी महत्वपूर्ण हिस्सा है जिसे मनुष्य गौण कर देता है।
हमसभी के जीवन में न जाने कितने लोग रिश्तेदारों के रूप में, कितने लोग दोस्तों के रूप में और कितने ही लोग जीवन के आवश्यकताओं के तहत नित हमारे जीवन से जुड़ते चले जाते हैं, जैसे पड़ोसी, दुकानदार और न जाने कितने लोग। मनुष्य अपने संबंधो की श्रंखला में नित नयी कडियाँ पिरोता रहता है। लेकिन वो यह भूल जाता है की संबंधो की प्रत्येक कड़ी उक्त श्रंखला में अपना एक अलग ही महत्व रखती हैं। संबंधो की श्रंखला में नित नयी कड़ी को पिरोना आसान है लेकिन उक्त श्रंखला के प्रत्येक कड़ी को महत्व देते हुए उसे बरक़रार रखना शायद उतना ही मुश्किल भी है।
हमसभी के जीवन में न जाने कितने लोग रिश्तेदारों के रूप में, कितने लोग दोस्तों के रूप में और कितने ही लोग जीवन के आवश्यकताओं के तहत नित हमारे जीवन से जुड़ते चले जाते हैं, जैसे पड़ोसी, दुकानदार और न जाने कितने लोग। मनुष्य अपने संबंधो की श्रंखला में नित नयी कडियाँ पिरोता रहता है। लेकिन वो यह भूल जाता है की संबंधो की प्रत्येक कड़ी उक्त श्रंखला में अपना एक अलग ही महत्व रखती हैं। संबंधो की श्रंखला में नित नयी कड़ी को पिरोना आसान है लेकिन उक्त श्रंखला के प्रत्येक कड़ी को महत्व देते हुए उसे बरक़रार रखना शायद उतना ही मुश्किल भी है।
सम्बन्ध बनते भी हैं और टूट भी जाते हैं और हम उक्त सम्बन्ध के टूटने का जिम्मेवार दूसरे को मान लेते हैं। लेकिन शायद हम यह भूल जाते हैं की उक्त सम्बन्ध के टूट जाने के कारन क्या रहे जिस से की उन कारणों की खोज करके और निराकरण करके उक्त सम्बन्ध को पुनर्जीवन प्रदान करें। आप को जानकर यह आश्चर्य होगा की अधिकांशतः संबंधो को ग़लत अवधारणा या भ्रम के कारन तोड़ दिया जाता है। अगर ऐसे स्थिति में कारणों के मूल में जाने का प्रयास किया जाए तो हम पाते हैं की फलां के द्वारा ग़लत और झूठी शिकायत किए जाने के कारन ऐसी स्थिति बनी। परन्तु दुख इस बात का है की न जाने कितने सम्बन्ध इन्ही ग़लत अवधारणा के कारन टूट गए। ऐसी स्थिति मनो-विदारक और चिंतनीय है और आज आवश्यकता है की संबंधो को मात्र औपचारिक परिणाम न मान कर उसको एक बहुमूल्य रत्न की तरह सहेजे और समेटे तभी हम अपनी संबंधो को कारगर रख पाएंगे।
अब सवाल उठता है की संबंधो को सहेजे कैसे ? लेकिन इसकी चर्चा हम आगे करेंगे। पहले ये तो जान लें की संबंधो को बनाये कैसे कोयोंकी अगर संबंधो को बनने से पूर्व ही कुछ बैटन का अगर ध्यान रखा जाए तो समझ लीजिये की आपने संबंधो को बरक़रार रखने का नीव तैयार कर लिया। जी हाँ, सम्बन्ध भी माकन की तरह ही बनाये जाते हैं। मकान बनने से पहले हम उसकी नींव की मजबूती का ख्याल रखते हैं जिस से की मकान मजबूत बन सके। फ़िर मकान के बन जाने के बाद उसको सजाते और सवारते हैं। इसी प्रकार से संबंधो की नींव रखिये फ़िर सम्बन्ध को नींव पर सम्बन्ध को आगे बढाइये यानी मकान बनाइये और फ़िर संबंधो के लोकाचार के मध्यम से उसको सजाइए और सवारिये। हमेशा ध्यान रखिये, सम्बन्ध का नींव मजबूत जरूर हो अन्यथा ऐसे संबंधो को टूट जाते देर नही लगता और अनावश्यक दुख और तनाव होता है। अब प्रश्न है की संबंधो की नींव क्या है ? जी हाँ, मकान की नींव ईंट, बालू, सीमेंट इत्यादि होते हैं लेकिन संबंधो के नींव ये नही होते क्योंकि मकान तो भौतिकता का परिचायक है इसलिए इसके निर्माण में भौतिक सामग्री का होना आवश्यक है परन्तु सम्बन्ध तो भावनातमक लगाव है और इसके निर्माण में भावनात्मक लगाव से जूरी सामग्रीया लगाई जाती हैं। और वो सामग्रियां हैं विश्वास, अहसास, आदर, एक दुसरे के विचारों का सम्मान, एक दुसरे के समस्याओं के निराकरण हेतु चिंतन एवं पहल, एक दुसरे की देखभाल, सकारात्मक विचार एवं भाव, भावनात्मकता, विचारो का आदान प्रदान और एक दुसरे की समस्यों को अपनी समस्या मान कर उक्तानुसार निराकरण। अगर संबंधो को बनने से पूर्व इतनी बातो का ध्यान देते हुए सम्बन्ध बना लिया तो समझिये आपका सम्बन्ध लगभग मजबूत तो हो ही गया और नींव भी अच्छी पर गयी। लेकिन कहते हैं सीर्फ नींव को मकान नही कहते बल्कि उक्त नींव के बाद के निर्माण का भी मकान में बहुत महत्व है। क्योंकि केवन नींव मकान नही है और बिना नींव के मकान स्थाई नही है। संबंधो को लोकाचार, व्यवहार, खुशियों और सहयोग से मकान का रूप दिया जाता है। अब प्रश्न ये है की संबंधो को सहेजे कैसे ? इसके बारे में तो बस इतना ध्यान दीजिये की संबंधो को उतना ही विस्तृत कीजिये जितना की आप सहेज सकते हो। जैसे आप बहुत बड़ा मकान या कई मकान बना लेते हैं लेकिन समय और पैसे के आभाव में उनकी देखभाल यानि लोकाचार और व्यव्हार तक बनने का समय नही मिल पता। ऐसे ही स्थिति में मकान भी रुग्न हो जाते हैं और इस प्रकार सम्बन्ध भी। मतलब ये की, कई लोग संबंधो को व्यवहार कुशलता का मानक समझते हैं यानि जितने ज्यादा सम्बन्ध उतना ही व्यवहार कुशल। मगर ऐसा नही है, ऐसे लोगो के संबंधो की संख्या तो अधिक होती है लेकिन पुराने संबंधो में से कई टूट चुके होते हैं। इसलिये जरूरी है की संबंधो को अधिकाधिक बनाने से बेहतर है कम सम्बन्ध बनाये लेकिन उन्हें निभाए। उतना ही सम्बन्ध बनाये जितना की आप निभा सकें जिसके लिए समय दे सकें, उनके समस्यों को समझ और निवारण कर सकें अन्यथा बीमार सम्बन्ध बनाने और उसके टूट जाने पर दुखी होने से अच्छा है की संबंधो के क्वालिटी पर ध्यान दिया जाए न की क्वांटिटी यानि संख्या पर।
संबंधों पर आपके और अधिक विचार सदर आमंत्रित हैं जिस से की संबंधो के बारे में और जाना-समझा जा सके। अगर संबंधो को और बेहतर बनने की सुझाव या संबंधो से सम्बंधित अपनी समस्या हमें इस ब्लॉग के मध्यम से देना चाहते हैं तो आपकी समस्या भी आमंत्रित है और हम यह प्रयास करेंगे की आपकी समस्या का समुचित निदान उपलब्ध कराया जाए।
संबंधों के प्रति समर्पण से सम्बंधित एक कहानी मेरे एक मित्र ने बताई जो संबंधों के प्रति समर्पण के भाव को परिभाषित करने के लिए पर्याप्त है, वो कहानी है :--
एक लड़का और एक लड़की दोनों साथ-साथ खेल रहे थे। लड़के के पास खुबसूरत कंचों का डब्बा था और लड़की के पास स्वादिष्ट मिठाइयों का। लड़के ने लड़की से कहा--"तुम मुझे स्वादिष्ट मिठाइयों का डब्बा दे दो तो मैं तुम्हे अपना खुबसूरत कंचों का डब्बा दे दूँगा। लड़की ने अपनी सहमती जताई। परन्तु, लड़के ने अपने कंचों के डब्बे में से कुछ अति-खुबसूरत कंचे चुपके से निकल लिए और बाकी कंचों को लड़की को दे दिया। लड़की ने उन कंचों के बदले अपनी साड़ी स्वादिष्ट मिठाइयां उस लड़के को इमानदारी से समर्पित किया और दोनों खुशी-खुशी अपने घर को चल दिए।
उस रात लड़की इस वाकये से निश्चिंत होकर शान्ति से सोयी परन्तु लड़के को नींद ही नही आ रही थी क्योंकि वो अब भी कंचे वाली बात को लेकर परेशां था की कहीं लड़की ने भी तो उसके साथ धोखा देकर अपने मिठाई के डब्बे में से कुछ अधिक स्वादिष्ट मिठाइयां चुपके से अपने पास तो नही छुपा लिया जैसे उसने अपने कुछ अति-ख़ूबसूरत कंचों को छुपा लिया था ? और ये सोच-सोच कर लड़का पूरी रात सो न सका परन्तु लड़की बड़े आराम से सोयी।
कहानी का निष्कर्ष -- "अगर आप अपने संबंधों के प्रति पुर्णतः यानि शत-प्रतिशत रूप से समर्पण भाव एवं इमानदारी के साथ भावनात्मक रूप से नही जुड़ते हैं तो संबंधों में भ्रम की स्थिति अनिवार्यतः उत्पन्न हो जाती है, भले ही दुसरे व्यक्ति ने अपना शत-प्रतिशत यानी पूर्ण समर्पण ईमानदारी के साथ आपको दिया हो। अगर लड़के ने अपना शत-प्रतिशत कंचे ईमानदारी के साथ उस लड़की को दिया होता, तो निशित रूप से वो लड़का भी उसी लड़की की तरह चैन की नींद सो पता। साथ ही, यह कहानी यह भी सीख देती है की जब भी हम ग़लत करते हैं, हम दूसरो को भी बिना तर्क-युक्ति, बिना तथ्य-आंकडो एवं बिना विश्वास के ही, ग़लत समझने लगते हैं या समझने का प्रयास करने लगते हैं। सदैव हमारी अपेक्छायें दुसरो से बेहतर पाने और स्वयम दोयम दर्जे का देना सिखाती है और अपेक्छा अनुरूप न मिलने की स्थिति में हम तनावग्रस्त हो जाते हैं और अपने भाग्य, अपने निर्णय, अपने संबंधों और दुनिया-जहाँ को दोषी मन ने लगते हैं। परन्तु अपने कमियों का आत्मावलोकन करना भूल जाते हैं और अपने कमियों का एहसास भी हमे नही हो पता क्योंकि जहाँ आत्मावलोकन है वहीँ पर एहसास भी है।
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